भूमिहार जाति का इतिहास: स्वाधीनता संग्राम से आधुनिक बिहार तक

आज के इस आर्टिकल में हम बात करेंगे बिहार के सबसे ताकतवर जाती भूमिहार की जो बिहार की सियासत में हमेशा से सबसे अग्रणी रहे है चाहे बात हो आज़ादी की लड़ाई या बिहार की राजनीति में भूमिहार जाति का प्रभाव काफी अहम रहा है और इस समुदाय ने आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक राजनीति और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

1857 की क्रांति का पहला बिगुल इसी जाती के लोगो ने बजाया

1857 की क्रांति का बिगुल बजाने वाले व्यक्ति मंगल पांडे जो भूमिहार जाती से थे, वो ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल इंफेन्ट्री के सिपाही थे, मंगल पांडे ने 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी में चर्बी लगे कारतूसों के विरोध में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। मंगल पांडेय के अदम्य साहस और शौर्य ने 1857 की क्रांति को जन्म दिया, जिसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी और जिसने ब्रिटिश हुकूमत को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया , भले ही उन्हें फांसी दे दी गई हो। उनके बलिदान ने भारतीयों में आजादी की भावना को जगाया, जो बाद में 1947 में देश की स्वतंत्रता में परिणत हुई।

आज़ादी की लड़ाई में भूमिहार समाज का गौरवशाली इतिहास

आज़ादी की लड़ाई में भूमिहार समाज का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है, जिसमें 1857 के विद्रोह के नायक बाबू कुंवर सिंह से लेकर गांधीजी के सत्याग्रह के दौरान कई बुद्धिजीवी शामिल थे। स्वतंत्रता संग्राम में इस समुदाय का योगदान महत्वपूर्ण रहा है, जिसमें कई नेताओं ने असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके अलावा, भूमिहारों ने किसान आंदोलनों में भी अग्रणी भूमिका निभाई और कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

हिंदी साहित्य से लेकर बिहार की राजनीती में भूमिहारो का प्रमुख योगदान

अगर साहित्य और कला की बात की जाय तो रामधारी सिंह दिनकर जी जो की एक भारतीय हिंदी भाषा के कवि, निबंधकार, स्वतंत्रता सेनानी, देशभक्त और शिक्षाविद थे, वो भी भूमिहार समाज से आते है। बिहार एक अलग प्रांत के रूप में 22 मार्च, 1912 को बना था, जब अंग्रेजों ने इसे बंगाल से अलग किया था। बाद में, 1 अप्रैल, 1936 को बिहार और उड़ीसा अलग-अलग प्रांत बन गए। भारत के संविधान के तहत 26 जनवरी, 1950 को बिहार को एक राज्य का दर्जा दिया गया। श्री कृष्ण सिंह (सिन्हा) जिन्हें श्री बाबू के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय राज्य बिहार (1946-61) के पहले मुख्यमंत्री थे । द्वितीय विश्व युद्ध की अवधि को छोड़कर, सिन्हा 1937 में पहली कांग्रेस सरकार के समय से लेकर 1961 में अपनी मृत्यु तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने बैद्यनाथ धाम, देवघर में दलितों के प्रवेश का नेतृत्व किया । वह जमींदारी प्रथा को समाप्त करने वाले देश के पहले मुख्यमंत्री थे । ब्रिटिश भारत में उन्हें लगभग आठ साल की कैद हुई थी । उन्होंने सामूहिक बैठकें कीं जिनमें उन्होंने भाषण दिया। सार्वजनिक भाषण में उनके “शेर जैसी दहाड़” के लिए उन्हें बिहार केसरी के रूप में जाना जाता था । चुकी श्री कृष्ण सिंह भूमिहार समाज से आते है इस वजह से उनके समाज के तरफ से उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग हो रही हैं।

भूमिहार समाज के गौरव स्वामी सहजानंद सरस्वती: किसान एकता और संघर्ष के प्रतीक

स्वामी सहजानंद सरस्वती को भारतीय किसान आंदोलन का जनक माना जाता है, जिन्होंने किसानों के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई और उन्हें संगठित किया। उन्होंने 1929 में बिहार प्रांतीय किसान सभा और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जमींदार और औपनिवेशिक उत्पीड़न का विरोध करना था। उनका नारा था, “जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनाएगा।

प्रशासनिक सेवा से खेल के मैदान तक भूमिहारो का दबदबा

आईपीएस विकास वैभव एक 2003 बैच के बिहार कैडर के अधिकारी हैं, जो अपनी तेज-तर्रार छवि और सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कम उम्र में ही यूपीएससी परीक्षा पास की और उन्हें आईपीएस रैंक मिली। वह समाज सेवा में भी सक्रिय हैं और “लेट्स इंस्पायर बिहार” (Let’s Inspire Bihar) अभियान के माध्यम से बिहार के युवाओं को प्रोत्साहित करते हैं। आचार्य किशोर कुणाल (पूर्व आईपीएस) अधिकारी थे, जो 1972 बैच के गुजरात कैडर के अधिकारी थे। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने पटना के महावीर मंदिर के सचिव और बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में सामाजिक कार्य किया। करुणा सागर (सेवानिवृत्त आईपीएस), प्रत्यय अमृत (आईएएस), अजय कुमार द्विवेदी (सेवानिवृत्त आईएएस), अरविन्द कुमार सिंह (सेवानिवृत्त आईएएस) जो प्रशाशनिक सेवा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे चुके है। अभिषेक पल्लव(पुलिस अकादमी चंदखुरी एसपी), मनोज राय, संजय राय, दीपक कुमार (वर्तमान कमिश्नर आगरा) वर्तमान में अपनी सेवा दे रहे है। ईशान किशन एक भारतीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर हैं, जो बाएं हाथ के बल्लेबाज और विकेटकीपर के तौर पर खेलते हैं और घरेलू क्रिकेट में झारखंड के लिए खेलते हैं। उन्होंने मार्च 2021 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया। वह 2016 अंडर-19 क्रिकेट विश्व कप के लिए भारतीय टीम के कप्तान थे और दिसंबर 2022 में बांग्लादेश के खिलाफ वनडे दोहरा शतक लगाने वाले सबसे कम उम्र के क्रिकेटर बने, जो भूमिहार समाज के लिए गौरव का पल था